दीपचंद साहू को दिए आशीर्वाद की वापसी


बाबा कालूरामजी, बाबा कीनारामजी, बाबा बीजारामजी, बाबा रामजीवन रामजी, भगवान गौतम रामजी
क्रमश:
हे वीरांगने, सुनो! सैदपुर में दीपचन्द साहू नामक रेवड़ी के एक दुकानदार थे. महाराज श्री कीनाराम उनकी दुकान से रेवड़ी खाया करते थे. दीपचन्द साहू से बहुत ही खुश होकर एक दिन बाबा की ना राम ने उसे आशीर्वाद दिया- 'फलो- फूलो.' बाद में उसने खांडसारी की मिल बैठाई और धीरे-धीरे इतना सुखी-संपन्न हो गया कि 'सैदपुर भीतरी' में उसके मुकाबिले का दूसरा कोई धनाढ़य व्यक्ति न रहा और गाजीपुर जनपद के इने-गिने व्यक्तियों में उसकी गिनती होने लगी. दीपचन्द साहू ने जमींदारी भी खरीदी. उन्होंने लाखों रुपए लगाकर वहां एक मंदिर भी बनवाया. एक बार महाराज श्री कीनाराम सैदपुर गए हुए थे, जब उन्होंने दीपचंद साहू को बुलावा भेजा था. दीपचंद साहू ने महाराज श्री कीनाराम को संदेश भेजा- 'बाबा से कह
दीजिए हम पूजा कर रहे हैं. शीघ्र ही आ रहे हैं. थोड़ा रुकेंगे.' महाराज श्री कीनाराम चलते बने. परिणामत: सैदपुर का वह मंदिर पुजारी विहीन होकर ही उपेक्षित स्थिति में पड़ा हुआ है. बाबा कीनाराम की उपेक्षा करने के कारण दीपचंद साहू का परिवार स्वयं भी उपेक्षित होकर रोटी के लिए मुहताज है.
वासुकीनाथ में उपदेश हे भस्मांगने!
वैद्यनाथ धाम क्षेत्र में वासुकी ग्राम है जहां वासुकीनाथ का मंदिर है. वहां विचरते हुए अघोरी बाबा कीनाराम एक सप्ताह तक एक बेल के वृक्ष के नीचे साधनारत थे. पास-पड़ोस के ग्रामीण संध्या बेला में महाराज श्री कीनाराम के सत्संग में उपस्थित होते थे. वहां विचरने वाले साधु लोग भी उपस्थित होते थे. महाराज श्री कीनाराम का सारगर्भित उपदेश अनवरत चलता रहा. उसे सुनकर जनसमूह और संतगण अपने को कृतकृत्य समझते थे. बाबा कीनाराम कहते थे- 'जीवन जीने के लिए नहीं है. जीवन मरने के लिए भी नहीं है. जीवन जानने के लिए है. मौत देह की होती है, न कि आत्मा की. सन्यास-वैराग्य देह-बुद्धि का विषय है, न कि आत्मा का. आत्मा शुद्ध चैतन्य है. उसमें किसी का प्रतिबिंब नहीं होता है. देह और मन में ही प्रतिबिम्ब होता है. बंधन और मोक्ष मन का ही होता है. जनमता और मरता देह है, न कि आत्मा.' क्रमशः
श्री ओकारेश्वर
क्रमशः से आगे ...
विन्ध्य ने कहा- 'हे देवर्षि! आपको मुझमें ऐसी कौन सी कमी दिखलायी दे रही है, जिससे आप दुखी होकर इस प्रकार गर्म निःश्वास ले रहे हैं.' देवर्षि नारद बोले- 'विन्ध्याचल! यद्यपि तुम सर्वगुण संपन्न हो, किंतु मेरु पर्वत के समक्ष तुम्हारी कोई महत्ता नहीं है. उसकी चोटियां देवलोक तक पहुंची हुई हैं. मेरु देवताओं का विहार स्थल है. उसके सामने तुम किसी गणना में नहीं हो.' देवर्षि नारद के इस प्रकार कहकर चले जाने पर विन्ध्य पर्वत दुःख और शोक में निमग्न हो गया. उसने इस शोक को मिटाने के लिए भगवान आशुतोष सदाशिव की आराधना करने का निश्चय किया और साक्षात ओंकाररुपी शिव की शरण में गया. वहां वह भगवान शिव की पार्थिव मूर्ति का निर्माण करके नित्य पूजन-अर्चन, जप और ध्यान करने लगा. छ: महीने की कठोर
तपस्या के बाद भगवान सदाशिव उस पर प्रसन्न हुए. उन्होंने विन्ध्याचल को अपने दिव्य स्वरुप का दर्शन कराया. योगियों के लिए भी अगम्य भगवान शिव के उस देव दुर्लभ स्वरुप को देखकर विन्ध्याचल भाव विभोर हो गया. उसने भगवान आशुतोष की स्तुति की. भगवान सदाशिव विन्याचल पर प्रसन्न होकर बोले- 'विन्ध्य! तुम्हारी श्रद्धा, भक्ति और कठोर तपस्या से मैं परम प्रसन्न हूं. मेरे भक्त के लिए कुछ भी प्राप्त करना असम्भव नहीं है. मैं अपने भक्तों की सभी कामनाओं को सहज ही पूर्ण कर देता हूं. इसलिए तुम्हारी जो भी इच्छा हो, मुझसे वह मांगकर संतुष्ट हो जाओ.' विन्ध्य ने कहा- 'हे महेश्वर! यदि आप मेरी आराधना से संतुष्ट और प्रसन्न हैं तो मुझे संपूर्ण कार्य के लिए सिद्धिप्रदायिनी सद्ठुद्धि प्रदान करके मुझ पर अनुग्रह करें.'
भगवान शिव बोले-'पर्वतराज! तुम्हें मैं वह उत्तम बुद्धि प्रदान करता हूं, जिसके द्वारा तुम्हारे सभी कार्य सहज ही सिद्ध हो जाएंगे. तुम्हारा कल्याण हो.' जिस समय भगवान शिव विन्ध्य के समक्ष प्रकट हुए, उसी समय देवगण एवं विशुद्ध चित्तवाले अनेक महात्मा वहां पधारे. उन लोगों ने भी भगवान शिव की आराधना एवं अनेक प्रकार के स्तोत्रों के द्वारा स्तुति की और भक्तों के अभीष्ट को सिद्ध करने के लिए सदैव वहां निवास करने के लिए प्रार्थना की. भगवान शिव ने प्रसन्नतापूर्वक उनके अनुरोध को स्वीकार कर लिया और भगवान शिव तभी से वहां ज्योतिर्लिंग के रुप में स्थित हो गए. वहां स्थित श्रीओंकारेश्वर लिंग दो स्वरुपों में विभक्त हो गया. प्रणव के अंतर्गत जो सदाशिव विद्यमान हुए वे 'ओंकारेश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए. विन्ध्याचल के द्वारा पूजित पार्थिव मूर्ति से जो ज्योति प्रकट हुई वह परमेश्वर या अमलेश्वर नाम से विख्यात हुई. उस समय देवताओं और ऋषियों ने मिलकर उन ज्योर्तिलिंगों का पूजन किया. भगवान वृषभध्वज ने प्रसन्न होकर उन लोगों को अनेक वर प्रदान किया. क्रमशः (द्वादश ज्योतिर्लिंग से साभार.)



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